पिछले दिनों मोदी जी
एवं उनकी पार्टी
द्वारा हिंदी पर विशेष ध्यान दिए जाने के कारण
उन्हें काफी आलोचनाओ का सामना करना पड़ा था| इसके साथ ही कुछ
छात्र UPSC में आये बदलाव को लेकर आक्रोशित थे जो अंग्रेजी माध्यम के पेपर का विरोध कर
रहे थे|
मजे की बात तो यह है की कुछ लोग भारतीयों को “हिंदी” बोल के ही विवाद पैदा
कर देते है| हर एक भारतीय इस विषय पर अपनी राय रखता होगा| मुद्दा यह है कि कौन/क्या सही है| क्या वाकई हमें हिंदी कहलाने में
खुद को गौरवान्वित महसूस करना चाहिए या फिर हमे अंग्रेजी या किसी अन्य देश की भाषा
सीखने के लिए सोचना चाहिए| जितना सरल सवाल है, मेरे हिसाब से जवाब उतना ही कठिन|
इसके पक्षधर दलील उन देशो की देंगे जैसे जर्मनी, फ्रांस, चीन वगैरह
वगैरह, जहाँ उनके देशवासी अपनी मात्रभाषा का उपयोग करते हुए अपने देश को तरक्की की
और ले जा रहे है| वे अपनी मात्रभाषा के साथ समझौता किए बिना ही सफल है, और हम आज भी इसी जद्दोजेहद में है की में किस भाषा में बात करू |अब ये भी हमे दुसरे बताएँगे की हम किस भाषा में बात करे| खासकर राजनैतिक दल|
ये लोग इसका समाधान ढूंढने की जगह विवाद पैदा करने में ज्यादा विश्वास रखते है| बेवजह इसे भारत और फिर धर्म से जोड़कर अराजकता का माहौल उत्पन्न करते है| जब दुसरे धर्म के लोग भी भारतीय है तो इसको किसी एक धर्म से जोड़ने का क्या औचित्य है|
बहरहाल अगर हम व्यर्थ की बात न करते हुए इसके विश्लेषण पर ध्यान दे तो बेहतर होगा | तो मुद्दे की बात यह रह जाती है की आखिर हमारे लिए क्या आवश्यक है| क्या हमे भारतीय होने का सबूत देते हुए हिंदी को अपनाना चाहिए या फिर अंग्रेजी भाषा को चुनना चाहिए|
भूमंडलीकरण के इस दौर में हर एक अलग दिखने की जरुरत है| अगर आप सफलता पाना चाहते है तो न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि हिंदी एवं अन्य राष्ट्रों की भाषा को भी अपनाना चाहिये|
भारत जैसे देश में रोज़गार के अच्छे अवसर पाने के लिए आज युवाओं को
चाहिए की वे जितनी ज्यादा भाषा सीख सके उतना उनके भविष्य के लिए बेहतर होगा | हम एक पिछड़ती हुई अर्थव्यवस्था है | कम से कम अभी के हालात तो हमें इसकी
इज़ाज़त नहीं देते की हम उन देशो की राह पर चलते हुए मात्रभाषा के प्रयोग को प्राथमिकता दे| इसका यह मतलब नहीं है की सफल होने के लिए अंग्रेजी आवश्यक है, किन्तु खुद की बेहतरी के लिए हम अंग्रेजी का चुनाव करने में झिझकना नहीं चाहिए|
अंग्रेजी
भाषा के उपयोग में हमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए
और वैसे भी अगर हम किसी देश में जाते है या हमारे यहाँ कोई आता है तो हमे एक
मध्य भाषा का चुनाव तो करना ही पड़ेगा जो की हम दोनों के लिए समझने में आसान हो| अभी की परिस्थिति यह है की या तो हम अंग्रेजी भाषा का चुनाव करे या फिर
सांकेतिक भाषा का, जो की थोडा मुश्किल होगा|
खुद की बेहतरी के लिए हमे न सिर्फ अंग्रेजी अपितु और भी कई भाषाओ की जानकारी रखना चाहिए| बेशक हिंदी हम भारतीयों की पहचान है, पर ये हमे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ "रोज़गार" दिलाने में अंग्रेजी से थोडा पीछे है|
इसलिए हमे असहज न होते हुए इस भाषा को जरुर चुनना चाहिए|
पर साथ ही साथ हमे हिंदी में पारंगत होना भी जरुरी है जिसको हम अपनी मात्रभाषा होने के कारण "बौना" बना देते है| यह एक बहुत ही सशक्त भाषा है जिस पर हमे गर्व होना चाहिए|
http://www.quora.com/Sumeet-Patel-3/My-Views/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8
-सुमीत पटेल
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-सुमीत पटेल
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